मच्चित्ता मदगतप्राणा बोधयन्तः परस्परम|
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति||9||(दशम अध्याय)
श्लोकार्थ :-, वे मुझमें चित्त तथा प्राणों को लगाकर आपस में मेरा गुणगान करते हुए सदा संतुष्ट और प्रसन्न रहते हैं।
भाष्य :- परमात्मा की प्राप्ति करनेवाले निरन्तर परमात्मा में अपने को सयुक्त रखते हैं। परमात्मा की गुणों की आपस मे चर्चा करते हुए वे सदा सन्तुष्ट तथा प्रसन्न रहते हैं, क्योंकि वे सर्वोपरि ज्ञान, आनन्द, ऐश्वर्ययुक्त परमात्मा को अब प्राप्त कर चुके होते हैं। परमात्मा से बढ़कर अन्य कौन- सा पदार्थ अब उनके लिए प्राप्य रह गया?
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति।।10।।
श्लोकार्थ :-उन सदा परमात्मा में आत्मा को जोडनेवालों को, प्रेमपूर्वक भजनेवाले भक्तों को मैं वह उच्च ज्ञान देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं।
भाष्य :- परमात्मा में अपनी आत्मा को गुरु-विधान से सदा जोड़ने की कला जानकर उस स्थिति में रहनेवाले तथा जलमिनवत प्रेम परमात्मा में रखनेवाले भक्तों को परमात्मा उच्च ज्ञान प्रदान करता है। इस प्रकार वे परमात्मा के रहस्यपूर्ण ज्ञान को प्राप्तकर अपना जीवन धन्य बना लेते हैं। (गिताभाष्य, भाष्यकार-सद्गुरु आचार्य श्रीस्वतंत्रदेव जी महाराज)बोलिये सदगुरुदेव भगवान की जय हो।
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